Wednesday, November 25, 2015

धनधान्य से परिपूर्ण है भिलंगना घाटी
- शशि मोहन रवांल्टा

घुत्‍तू बाजार का मनोहारी दृश्‍य

टिहरी जनपद के घुत्‍तू भिलंग घाटी के पंवाली-त्रियुगीनारायण मार्ग पर स्थित ऋषिधार गांव बहुत ही रमणीक है। ऋषिधार गांव का प्राचीन नाम ऋषिद्वार है।पंवाली से त्रियुगी नारायण होते हुए कर्णप्रयाग और उसके बाद बद्री-केदार का परंपरागत मार्ग इसी गांव से होकर जाता है। ऋषिधार प्राचीन काल में ऋषियों की तपस्‍थली बाताई जाती है। ऋषिधार यानि धार के ऊपर ऋषियों की तपस्‍थली। ऋषिधार गांव वाकई धार के ऊपर है, गांव में मकान भी इसी स्थिति में हैं और बहुत ही सुंदर, मनमोहक है।
सूर्यप्रकाश सेमवाल जी ने जब अपने गांव के बारे में बताया तो मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ी। उन्‍होंने बताया कि यहां कभी ऋषियों की तपस्थली  थी, यहां बूढ़ा केदार से होते हुए परम्परागत चार धाम के यात्री पीडब्ल्यूडी की सड़क के रास्ते मार्ग से जाते हैं। मुख्य बाजार घुत्तू से एक मार्ग देवलिंगगंगी होते हुए खतलिंग और सहस्रताल की ओर जाता है तो दूसरा रानीडांगऋषिधारसटियालामल्ला गवांणा की सीमा को स्पर्श करता हुआ पंवाली की ओर जाता है। भिलंगना घाटी से ही पांडवों ने खतलिंग की यात्रा की थी। घुत्‍तू भिलंग घाटी का यह गांव बहुत ही प्रसिद्ध है, यहां के शास्‍त्री, आचार्य और परंपरागत कर्मकांडी पंडित पूरी घाटी में मशहूर हैं। गांव के वयोवृद्ध आचार्य पंडित नत्‍थी लाल शास्‍त्री जी हैं। शास्‍त्री जी बहुत सरल और मृदुभाषी हैं जो लगभग 80 वर्ष की आयु के हैं। इनके नाम उत्तराखंड के कई जिलों सहित इस क्षेत्र में भी लगभग 5000 (पांच हजार) भागवत, देवीभागवत, शिवपुराण व अन्‍य सप्ताह कर्म दर्ज हैं। शास्‍त्री जी ख्‍याति प्राप्‍त और अपनी शास्‍त्र विद्या के लिए बहुत ही प्रसिद्ध हैं। शास्‍त्री जी पहले घुत्तू स्कूल में शिक्षक एवं बाद में आर्मी में धर्म शिक्षक के पद से सेवानिवृत्‍त हैं। मेरा सौभाग्‍य है कि मुझे ऐसे विद्वान मनीषी से मिलने का सुअवसर प्राप्‍त हुआ।

गांव में इस तरह छत पर सुखाया जाता है धान

घुत्तू भिलंग घाटी बहुत ही सुंदर और आकर्षक है, यहां का वातावरण एकदम स्‍वच्‍छ और जल निर्मल है। भिलंगना नदी भले ही देवलंग बांध बनने के बाद कम दिखाई पड़ती है लेकिन सड़क के साथसाथ बहती भिलंगना राहगीरों को अनायास आकर्षित करती है। इस क्षेत्र में रास्ते में रानीगढ़ का प्रसिद्ध मंदिर, घुत्तू में प्राचीन श्री रघुनाथ मंदिर, भैरव मंदिर, सकरोड़ा देवी का मंदिर सहित अनेक छोटेछोटे सिद्धपीठ हैं। इस क्षेत्र का सबसे मान्य और सिद्धपीठ प्राचीन बगुलामुखी पीठ है। जहां बुगीलाधार नामक जगह में 25 से भी अधिक गांवों की मुल्क की देवी जगदी जगदम्बा का भव्य मंदिर है। यहां नवरावत्र के दिन मुझे भी व्यक्तिगत रूप से सिद्धपीठ में मां भगवती की आराधना का सुवअसर मिला। बुगीला से इस पूरे क्षेत्र का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। एक ओर पोरा का डांडा तो दूसरी ओर खतलिंग ग्लेशियर, खैट पर्वत और विशोन पर्वत दिखाई पड़ते हैं। भिलंगना की दो बड़ी सहायक नदियां गवांण गढ़ और चड़ोली गांव के साथ निकलने वाली कनगढ़ नदी भी मोहक लगती है।

धान की खेती के लिए मशहूर है यह सेरा

     भिलंगना के गांव धनधान्‍य से परिपूर्ण है, यहां हर किस्‍म के अनाज, दालें और विभिन्न किस्‍म की सब्जियां गांववालों द्वारा उगाई जाती हैं। गांव के लोग बहुत ही सहज, सरल और मृदुभाषि हैं। मुझे एक रात इस गांव में रहने का सौभाग्‍य प्राप्‍त है।
     यहां के लोगों का पहचान उत्‍तराखंड के विभिन्‍न क्षेत्रों की तरह ही है अन्य व्यवसायों के साथ यहां कई पूर्व सैनिक हैं। महिलाएं साड़ी-ब्‍लॉज, धोती-कुर्ती व सलवार कमीज पहनती है और सिर पर स्‍कार्फ, साफा बांधे (सिर अक्‍सर ढका रहता है) रहती है। पुरुषों का पहनावा पैंट-शर्ट एवं बुजुर्ग लोग कुर्ता-पायजामा और कोट पहनते हैं।

गांव का मुख्‍य बाजार घुत्‍तू भिलंग है। गांव के ज्‍यादातर लोगों ने घुत्‍तू बाजार में अपने मकान बनाए हुए हैं। गांव में युवा आबादी न के बराबर है, क्‍योंकि यहां के युवा अपने बेहतर भविष्‍य, पढ़ाई-लिखाई और रोजगार के लिए गांव के पलायन कर चुके हैं। इनके बच्‍चे ज्‍यादातर हरिद्वार और ऋषिकेश में हैं। यह गांव भी पलायन का दंश झेल रहा है। घुत्‍तू बाजार आसपास के 35 से 40 गांवों का मुख्‍य बाजार है। घुत्‍तू इंटर कॉलेज इन सभी गांवों का एक मात्र शिक्षा का केन्‍द्र है। यहां इटर कॉलेज में छात्रों की संख्‍या 1000 से भी ज्‍यादा है। गांव के लोगों का कारोबार इसी बाजार से चलता है और दैनिक रोजमर्रा की चीजें भी इसी बाजार से उपलब्‍ध होती हैं। टिहरी जनपद का अंतिम सीमांत गांव गंगी है। गंगी गांव के बच्‍चे भी अपनी पढ़ाई के लिए यहां आते हैं। घुत्‍तू से गंगी गांव लगभग 25 किमी की दूरी पर है।

इस क्षेत्र के गांवों में पानी की कमी नहीं, और मेरा मानना है कि जिस गांव में पानी की कमी ना और वहां के लोग मेहनती हों तो वहां की धरती सोना उगल सकती है। गांव का मुख्‍य व्‍यवसाय कृषि और पशुपालन है। पूरे उत्‍तराखंड की तरह यहां भी महिलाएं ही सारा काम करती हैं, जो सुबह से शाम तक काम में व्‍यस्‍त रहती हैं। गांव के मर्द अक्‍सर बाजारों में देखे जा सकत हैं।

कुछ इस तरह काम करती है पहाड़ की महिलाए: अपनी पीठ पर गोबर ले जाती ऋषिधार की महिलाएं


गांव से जब आप नीचे घुत्‍तू बाजर के लिए ऋषिधार से उतरते हैं तो गांव के चारों ओर नजर दौड़ाने पर सुंदर और खेत मानों आपको अपनी ओर आकर्षित कर रहे हों। खेतों की आकृति में यहां का धान का सबसे बड़ा पट्टा 'बित्ती का सेरा' सबसे बड़ा धान का उत्पादक माना जाता है।  इन खेतों में अनाज, गेहूं, जौ, तिल, और विभिन्‍न प्रकार की दालें पर्याप्‍त मात्रा में पैदा होती हैं। यहां की खेती बहुत ही उपजाऊ है, लेकिन खेती आज भी परंपरागत और पुराने ढंग से ही होती है। यदि इस क्षेत्र के लोग रवांई घाटी के लोगों की तरह नकदी फसलों जैसे टमाटर, मटर, आलू, प्‍याज, अदरक की खेती करना शुरू कर दें तो यह क्षेत्र रवांई घाटी की तर्ज पर उत्‍तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे भारत में एक अपनी एक विशिष्‍ट पहचान बना सकता है, क्‍योंकि इस क्षेत्र में पानी पर्याप्‍त मात्रा में उपलब्‍ध है और यहां सिंचाई वाली खेती पहली से ही होती आ रही है बस जरूरत है तो आधुनिकीकरण की। 

वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ. हेमचन्‍द्र सकलानी, आचार्य पं. नत्‍थी लाल शास्‍त्री एवं शशि मोहन रवांल्‍टा

Wednesday, October 21, 2015



डॉ. कलाम के बहाने, घुत्‍तू भिलंग घाटी की सैर...
शशि मोहन रवांल्टा

घुत्‍तू भिलंग घाटी
   
पिछले सप्‍ताह भिलंग घाटी में जाने को अवसर प्राप्‍त हुआ। मौका था ‘भारतरत्‍न एवं पूर्व राष्‍ट्रपति स्‍व. डॉ. कलाम की जयंती’ (अंतरराष्‍ट्रीय छात्र दिवस) पर ‘राष्‍ट्रीय बाल प्रतिभा एवं वरिष्‍ट नागरिक सम्‍मान समारोह’ का। साथ ही सूर्यप्रकाश सेमवाल और रमेश सेमवाल जी द्वारा बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण के लिए स्‍वास्‍थ्‍य कैंप का आयोजन भी किया गया था।

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथि

   इस कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ साहित्‍यकार डॉ. हेमचन्‍द्र सकलानी जी थे। मुझे बतौर अथिति आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम पर्वतीय लोकविकास समिति एवं क्षेत्र के प्र‍बुद्ध लोगों द्वारा आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में बच्‍चों द्वारा बहुत ही सुंदर और आकर्षक प्रस्‍तुतियां पेश की गईं। कार्यक्रम में स्‍थानीय स्‍कूलों के बच्‍चों ने प्रतिभाग कर सुंदर एवं आकर्षक प्रस्‍तुतियां दी। इस बारे में जब आयोजकों और इंटर कॉलेज घुत्‍तू, भिलंग के प्राचार्य और शिक्षकों से बात हुई तो उन्‍होंने बताया कि यह कार्यक्रम बच्‍चों ने कुछ ही दिनों में तैयार किया है, क्‍योंकि आजकल यहां परीक्षाएं चल रही हैं इस वजह से छात्रों को तैयारी का ज्‍यादा मौका नहीं मिल पाया।
स्‍वागत गान प्रस्‍तुत करतीछात्राएं

     कार्यक्रम की आकर्षक प्रस्‍तुतियों को देखकर मैं अचम्‍भित था। बच्‍चों ने यदि मात्र दो दिन में इतनी सुंदर प्रस्‍तुतियां प्रस्‍तुत कीं। यदि इनकों एक-दो सप्‍ताह का समय मिल गया होता तो कार्यक्रम मेरी कल्‍पना से भी ज्‍यादा आकर्षक होता।
कार्यक्रम की शुरुआत स्‍वागत गान-
आवा श्रीमान आसन बिराजा, सुस्‍वागतम च,
पावन पर्व धेला धमाल, सुस्‍वागतम च, सुस्‍वागतम च,
दानस्‍याणू तैं सेवा स्‍वीकार, छोटा भुलों थैं जियाभोरी प्‍यार
ब्‍यैणियों की जयजयकार, ब्‍यैणियों की जयजयकार
आवा श्रीमान आसन बिराजा, सुस्‍वागतम च…..
    मुझे बतौर दर्शक कई छोटे-बड़े कार्यक्रमों में अक्‍सर जाने का अवसर अक्‍सर प्राप्‍त होता है। हर कार्यक्रम में की अपनी एक पहचान होती है, शायद स्‍वागत गान भी अक्‍सर कार्यक्रमों में गाया अथवा बजाया जाता है, लेकिन इस कार्यक्रम का स्‍वागत गान इस मायने में खास था कि यह पूर्णत: गढ़वाली भाषा में और शब्‍दों पर आप ध्‍यान दें तो बहुत सुंदर शब्‍दों के साथ इसकी रचना की गई है। 

पावन मेरू उत्‍तराखंड गीत की प्रसतुति

     इसके बाद देवताओं पैटावा कैलाश, हिमालय पूजण कैलाश….  गाने तो मुझे बहुत कुछ घूत्‍तु भिलंग घाटी और खतलिंग की घाटियों से रू-ब-रू करवाया। इस गांव में क्षेत्र के देवी-देवताओं, घाटियों और गंगी गांव तथा बद्री-केदार और गंगा-जमुना का बहुत ही सुंदर शब्‍दों में वर्णन किया गया है।
    यकिन मानिए यदि आप ये गीत सुनेंगे तो आपको खुद ही तय कर पाएंगे कि गीत को कितने सुंदर शब्‍दों में वर्णित किया गया है और किस तरह क्षेत्र और उत्‍तराखंड के नदी घाटियों और देवताओं का स्‍मरण किया गया है। इस गीत की खास बात यह भी थी कि यह छात्राओं द्वारा खुद ही गाया गया था। 

                   


पावन मेरू उत्‍तराखंड गीत की प्रसतुति   
आयोजकों द्वारा तीन गीतों को प्रतियोगिता में शामिल किया गया था, जिसमें पहला गीत देवताओं पैटावा, दूसरा पावन मेरा उत्‍तराखंड, गढ़भूमि गढ़देश (ये गीत आपने अक्‍सर आडियो या वीडियो में सुना और देखा होगा) इस गीत में उत्‍तराखंड के वीर-भड़ और क्रांतिकारियों का सुंदर वर्णन किया गया है। जिसमें श्रीदेव सुमन से लेकर माधोसिंह भण्‍डारी और तीलू रौतेली जैसी वीरगंनाओं का बहुत ही सुंदर शब्‍दों में वर्णन किया गया है। प्रतियोगिता का तीसरा गीत था ठंडों रे ठंडों था। इसके बाद पांडव नृत्‍य की बहुत ही सुंदर और मनमोहन प्रस्‍तुति छात्रों ने पेश की, लेकिन यह पांडव नृत्‍य प्रतियोगिता में शामिल नहीं था। 

पांडव नृत्‍य प्रस्‍तुत करते बच्‍चे

     प्रतियोगिता की निर्णायक मंडली ने पावन मेरा उत्‍तराखंड, गढ़भूमि गढ़देश को प्रथम पुरस्‍कार से नवाजा। यह गाना डीजे पर बजाया जा रहा था, लेकिन बच्‍चों ने इस गीत के हर पहलू को साक्षात मंच पर उतारा जिसमें उन्‍होंने श्रीदेव सुमन से लेकर माधोसिंह भण्‍डारी और तीलू रौतेली के पात्रों का सबको दर्शन कराए।
ठंडो रे ठंडों गीत प्रस्‍तुति देती छात्राएं

अंत में....

Sunday, December 1, 2013

चार दिवसीय अनुभव आधारित कार्यशला

सामाजिक पर्यावरणीय कल्याण समिति सेवा एवं यूकॉस्ट उत्तराखण्ड के तत्वाधान से आयोजित चार दिवसीय (30 नवंबर से 3 दिसंबर 2013) अनुभव आधारित कार्यशला का शुभारम्भ जिला पंचायत अध्यक्ष श्री नारायण सिंह चैहान एवं श्री ए0एस0 तोमर प्रधानाचार्य रा0इ0कालेज डामटा ने दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यषाला में 4 विद्यालय से के 140 बच्चों ने प्रतिभाग लिया कार्यषाला में विभिन्न विद्यालयों के प्रधानाचार्यो एवं डामटा क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों ने प्रतिभाग किया। 
मुख्य अतिथि श्री नारायण सिंह चैहान एवं प्रधानाचार्य ने उत्तरकाशी के सबसे दूर स्थित इण्टर कालेज जिसमें कि 99 प्रतिशत छात्र/छात्रायें अनु0जाति, अनु0जनजाति एवं पिछडी जाति के अध्ययनरत हैं कार्यशाला का आयोजन करने के लिये सामाजिक एवं पर्यावरणीय कल्याण समिति को धन्यवाद देते हुये कहा कि संस्था ने उन छात्र/छात्राओं की ओर ध्यान दिया जो वास्तव में पिछड़े हुये हैं तथा जिन्‍हें वास्तव में इस प्रकार के कार्यक्रम की आवश्‍कता है। उन्‍होंने 'सेवा' को प्रत्येक 6 माह में डामटा में कार्यशाला का आयोजन करने का अनुरोध किया।
उपाध्यक्ष श्री शोभेन्द्र सिंह राणा ने आस्‍वस्‍थ किया कि सेवा समिति का उद्देश्‍ ही उत्तराखण्ड के दुर्गम व पिछडे क्षेत्रों में कार्य करते हुये उन लोगों तक विकास की योजना पहुचाना है जो विकास से वंचित हैं। इससे पूर्व भी समिति ने यमुना वैली पब्लिक स्कूल, नौगांव व राजकीय इण्टर कालेज, खरादी में इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन विगत 3 वर्षों से करती आ रही है।
प्रथम एजुकेशन फाउण्डेशन एलायन्स फॉर साइन्स के संयोजक श्री आशुतोष उपाध्याय जी ने बताया कि विज्ञान को भाषा की तरह नहीं बल्कि अनुभव करके सीखा जा सकता है।
कार्यशाला में श्री यशवंत काला, श्रीमती दुग्रेशनन्दनी यादव, श्री सूरत सिंह अधिकारी, श्री दिनेश डोभाल, श्री सरदार सिंह राणा, श्री सुमारी, श्री विरेन्द्र रावत, श्री नारायण राणा तथा प्रथम एजुकेशन की सात सदस्यी टीम ने प्रतिभाग किया।

Monday, October 7, 2013

अनुभव आधारित बाल विज्ञान कार्यशाला

 अनुभव आधारित बाल विज्ञान कार्यशाला में मॉडल बनाते बच्‍चे

 अनुभव आधारित बाल विज्ञान कार्यशाला में मानव कंकाल मॉडल के साथ बच्‍चे

 कार्यशाला में मानव अपने मॉडलों को उत्‍साह से दिखाते बच्‍चे

विज्ञान के मॉडल देख चमत्कृत हुए लोग

  • दूर-दराज के स्कूलों में भी आयोजित होंगे विज्ञान शिविर

नौगांव। यहां अनुभव आधारित बाल विज्ञान कार्यशाला में बच्चों द्वारा बनाये गये विज्ञान मॉडलों को देखकर उनके शिक्षक व अभिभावक चमकृत हो गये।
छोटे-छोटे स्कूली बच्चों ने चार दिवसीय इस कार्यशाला में कागज के कंकाल तंत्र, फलाइट व स्ट्रोनॉमी (सूर्य, चांद व पृथ्वी) के मॉडल तैयार किये और उसके बाद उन्हें पेंटिंग के रूप में पेंसिल और रंगों की मदद से कागज पर भी उतारा।

इस विज्ञान शिविर का आयोजन सामाजिक एवं पर्यावरणीय कल्याण समिति (सेवा) ने प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन, नई दिल्ली व विज्ञान व तकीनीकी परिषद (यूकोस्ट) के सहयोग से यमुना वैली पब्लिक स्कूल नौगांव में किया गया। इसमें नौगांव के आसपास के 11 स्कूलो के 101 छात्रों ने हिस्सा लिया जो कक्षा 6 से कक्षा 8 तक के हैं।

प्रतिभागी छात्रो का कहना है कि खेल-खेल में विज्ञान को सीखने से हमें पता ही नहीं चलता है कि समय कैसे गुजर गया। उनका कहना था कि यदि इस तरह अन्य विषयों की भी पढ़ाई हो तो कोई बच्चा पढ़ाई में कमजोर नहीं रह सकता।

संस्था के सचिव शशि मोहन रावत ने बताया कि इस प्रकार की कार्यशाला इस पिछड़े क्षेत्र के नैनबाग, बड़कोट, पुरोला, मोरी, जखोल, रानाचट्टी तथा लिवाड़ी-फेताड़ी जैसे दूर दराज के स्कूलों में भी आयोजित की जायेंगी। जहां आज भी पहुंचने के लिए दो दिन का पैदल सफर है।

संस्था के संयोजक एवं वरिष्ठ पत्रकार विजेन्द्र रावत ने यूकॉस्ट उत्तराखण्ड, का आभार वक्‍त करते हुए कहा कि यूकॉस्‍ट के अध्यक्ष राजेन्द्र डोभाल ने रवांई-जौनपुर व जौनसार-बावर जैसे पिछड़े क्षेत्रों में बच्चों में विज्ञान प्रतिभा के विकास के लिए एलांयस फॉर साइंस जैसे स्तरीय कार्यक्राम के आयोजन में मदद दी।

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन, नई दिल्ली के टीम लीडर महेश पोखरिया ने बताया कि यहां के बच्चों में विज्ञान को सीखने की जितनी अधिक जिज्ञासा है उतनी जिज्ञासा शहरों के सुविधा सम्पन्न अंग्रेजी स्कूलों के बच्चों में नहीं है। यही कारण है कि ये अपेक्षाकृत तेजी से सीख रहे हैं। संस्था की योजना है कि इस पिछड़े क्षेत्रों में भविष्य में संस्था विज्ञान मेलों का आयोजन भी करेगी। ताकि छात्रों में विज्ञान के प्रति रूचि पैदा हो सके।

Monday, June 24, 2013

स्थानीय लोगों की कौन सुध लेगा?


- खच्चरों का तो कोई नामलेवा तक नहीं

- शशिमोहन रावत


सचमुच उत्तराखंड का मंजर बहुत खौफनाक है। सरकारी दावे, लोगों के आंसू, राहत पर राजनीति इन सब बातों से इतर आंकड़ों पर गौर करें तो तस्वीर रूह कंपाने वाली है। मरने वाले लोगों की संख्या तो सैकड़ों है ही, लेकिन विभिन्न जिलों के स्थानीय लोग और उनके मवेशी भी आपदाग्रसत हैं। उत्तराखंड में जीवन के पटरी पर लौटने मेें तो अभी बहुत वक्त लगेगा, लेकिन अब जो सचाई सामने आएगी उससे वाकई आप खौफजदा हो जाएंगे। आइए इधर-उधर की बात छोड़ सीधे आंकड़ों पर बात करें।

गौरीकुंड से केदारनाथ धाम के लिए 14 किमी पैदल मार्ग है। इस मार्ग पर 4500 खच्चर चलते हैं। पीक सीजन की वजह से तबाही वाले उस दिन ये सभी बुक थे। एक यात्री और एक खच्चर वाले को यदि जोड़ा जाए तो इनकी संख्या 9000 हो जाती है। संभवतः किसी किसी खच्चर पर एक व्यक्ति के साथ एक या दो बच्चे भी बैठे हों। अमूमन ऐसा होता है कि एक खच्चर बुक करने के बाद उसमें बच्चे को भी बिठा लिया जाता है। ऐसे में यह संख्या और ज्यादा हो जाती है। यदि हम अकेले खच्चरों की बात करें तो लगभग 4500 खच्चरों का कहीं कोई कोई अतापता नहीं है।

इसी ट्रैक पर 700 डंडी चलती हैं। एक डंडी ले जाने के लिए चार लोग लगते हैं। यात्रा सीजन होने की वजह से उस दिन ये सभी भी बुक थे। यदि इन सबको जोड़ा जाए तो डंडी ले जाने वालों की संख्या 2800 हो जाती है और इसमें बैठे 700 लोगों को मिलाकर कुछ 3500 लोग। तकरीबन पांच सौ कंडी संचालित होती हैं। एक कंडी के साथ दो लोग होते हैं जो एक यात्री को ले जाते हैं। इनकी संख्या भी 1500 के लगभग हो जाती है।
वहां होटलों और धर्मशालाओं में भी लोग ठहरे होंगे। यात्रा सीजन होने की वजह से मार्ग में यात्रा व्यवस्था और अन्य कार्यों के लिए सरकारी और गैर सरकारी कर्मचारी भी जाहिर तौर पर वहां होंगे। यदि तमाम अखबारों और टीवी चैनलों की रिपोर्टों पर गौर करें तो तबाही की उस खौफनाक रात को केदारघाटी में लगभग 30 हजार लोग थे।

अब दबे सुर में एक हजार लोगों के मारे जाने और बारह हजार लोगों निकालने का दावा सरकार कर रही है। केदारघाटी में सभी को निकाला गया है और हर कोई यात्रियों को निकालने की बात कर रहा है। लेकिन उनके बारे में कोई चिंता नहीं है जिनके घर उजड़ गए। परिवार के लोग लापता हैं। उनकी कुल मिलाकर कहीं कोई खबर तक नहीं हैं। यदि देखा जाए तो क्या किसी न्यूज चैनल या अखबार ने वहां से घोड़े-खच्चरों को जिंदा निकालने की बात कही? क्या वहां के स्थानीय लोगों के बारे में कहीं कोई खोज खबर है?

केदारघाटी में तमाम तरह की खबरें सुननें में आ रही हैं कि वहां महिलाओं के छेड़छाड़ और लूटपाट जैसी घटनाओं का जिक्र भी सोशल मीडिया, तमाम न्यूज चैनलों और अखबारों में जरूर हो रहा है। 

लेकिन सवाल है कि क्या यह सब करने वाले उत्तराखंड के ही लोग हैं? यहां होटल, रिसोर्ट और धर्मशालाएं ज्यादातर महानगरों के लोगों की हैं और स्थानीय लोग मात्र सेवादार या नौकर के तौर पर वहां काम करते हैं। वहां लूट-खसोट की सी बातें उठ रही हैं। क्या लूट-खसोट करने वाले स्थानीय लोग हैं? जबकि कई गांव वालों ने फंसे तीर्थयात्रियों को घर में रखा और उन्हें राह दिखाई। कुछ अपवाद हो सकते हैं। वहां के लोग रहने और खाने पीने की वस्तुओं को महंगा भी बेच सकते हैं लेकिन वह महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और लूटपाट जैसी हरकत नहीं कर सकते। सोशल मीडिया पर लोग अपनी आप बीती लिख रहे हैं और ऐसी हरकतों को करने वालों की पहचान छोटी आंख वाले या नेपालियों के रूप में बता भी रहे हैं।

आपदा की इस घड़ी में उत्तराखंड के तमाम लोग वहां फसे लोगों की हर संभव मदद कर रहे हैं। वहां खाने के लंगर लगाए जा रहे हैं। जिस से जो बन पड़ रहा है हर संभव मदद कर रहे हैं।

एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर में सेना ही हर विपत्ति के समय क्यों याद की जाती है? हमारा स्थानीय आपदा प्रबंधन महकमा, स्थानीय पुलिस और प्रशासन क्यों सक्रिय नहीं होता। क्या स्थानीय बेरोजगारों को राहत के काम की ट्रेनिंग नहीं दी जा सकती जिससे आगे फिर यदि ऐसी स्थिति आई तो वह उस से निपटने में सक्षम हो? क्या उनको उनकी कुशलता का परिचय नहीं देना चाहिए? क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकार को इस दिशा में नहीं सोचना चाहिए? क्योंकि वहां मौजूद पुलिस को यदि ऐसी किसी मुश्किल से निपटने के लिए ट्रेनिंग दी जाती तो जब तक सेना को पता चलता है या सेना पहुंचती है तब तक वह स्पाॅट पर बहुत कुछ कर सकते हैं?

सरकार को चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हो इसके लिए वहां हो रहे अंधाधुंध और बेतरतीब जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण कार्यों को तत्काल प्रभाव से रोका जाए। छोटी परियोजनायें गंगा-यमुना और तमाम तरह की छोटी बड़ी नदियों के प्रवाह के 100 मीटर के दायरें में किसी भी निर्माण को तत्काल प्रभाव से धराशाई किया जाए और नव निर्माण को सख्ती से रोका जाए। नदियों के पानी में सीवेज डालने का सिलसिला बंद किया जाना चाहिए क्योंकि क्योंकि आस्थावान तीर्थयात्री इस गंदगी से बैचेन होते हैं। नदी किरने आश्रम, होटल, धर्मशालाओं का सीवेज नदी में नहीं जाना चाहिए।  जो इलाका अक्सर शांत हुआ करता था वहां आज हर 10-15 मिनट के अंतराल में हेलीकाॅप्टर सेवा शुरू हो गई है, जिसे तत्काल बंद करने की जरूरत है। 

बुजुर्गों के मुताबिक केदारबाबा 50 या 100 या दो सौ साल पहले जैसे थे आज फिर वैसे ही हो गए हैं? सरकार को पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए लेकिन तमाम सावधानी के साथ। कि भविष्य में वहां किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर सख्त पाबंदी हो। वहां यात्रा पर आने और जाने वालों की एक निश्चित संख्या और एक दिन में 500 या 1000 यात्री जाएं और लौट आएं। वहां सिर्फ तीर्थ पुरोहितों के अलावा स्थानीय लोग ही रहें।