Saturday, September 10, 2011

तू मुझे याद करे और मैं महसूस न करू तो कहना...

फुरसत के लम्हों में कभी याद कर के देख,
आँखों से तेरे आंसू न छलक आएं तो कहना,
चाहत से भी बढ कर चाह है तुझे,
प्यार इतना ज़िन्दगी में मिल जाये तो कहना,
मुश्किल की घडियो मई अपनी पलकें झुका के देख .
उनमें मेरी तस्वीर न समाये तो फिर कहना...
जिंदगी के हर मोड़ पे मेरे प्यार का इम्तहान लेके तो देख...
हर मोड़ पर मेरी चाहत तेरा इंतज़ार करते न मिले तो कहना.
आरजू है एक बार तू मेरा दिल चीर के तो देख.
हर टुकड़े में तेरी तस्वीर नज़र न आये तो कहना...
जिंदगी को कुछ इस तरह सौप दिया है तुझे.
तू मुझे याद करे और मैं महसूस न करू तो कहना...
फुरसत के लम्हों में कभी याद कर के देख,
आँखों से तेरे आंसू न चालक आएं तो कहना.

Thursday, August 18, 2011

मैंने तुझसे बेपनाह मोहब्बत की है

तुम्हारी इज़ाज़त के बिना न चलूँ एक कदम,
तुम से कुछ इस तरह से चाहत की है.
तुम्हारे बिना ज़िन्दगी का कोई मकसद नहीं,
मैंने कुछ इस तरह तुम्हें पाने की तम्मना की है.
हमारे बीच हैं बंदिशें ज़माने की ,
मैंने फिर भी तुम से बेपनाह मोहब्बत की है.
मेरे दिल में बस जाओ तुम, मेरी धड़कन बनकर,
मैंने दिल कि गहराइयों से ये इबादत की है.
तुम्हारे रूठने का दर्द कितना मुश्किल है,
समझ सको तो महसूस करो,
तेरे बिना दम तोड़ देंगी ये सांसें,
मैंने उस मोहब्बत की कुछ इस तरह से हिफाज़त की है.
वो तस्वीर तेरी यादों की ,
वो अमानत तेरे अरमानों की
तेरी सूरत तेरी सीरत की चाह है मुझको
उसे पाने कि तमना की है.
मैंने तुझसे बेपनाह मोहब्बत की है.
मैंने तुझको पाने की दिल से इबादत की है...
शशि

Tuesday, July 5, 2011

लंबी उम्र चाहिए, तो हासिल कीजिए हैसियत

अगर आप लंबी उम्र पाना चाहते हैं तो कोशिश कीजिए कि आपको समाज में अच्छा रुतबा हासिल हो जाए। जी हां, एक नई रिसर्च में यह खुलासा हुआ है कि जो लोगजीवन के विभिन्न क्षेत्रों में तरक्की पाते हैं वे अधिक उम्र तक जीते हैं।
सफलता से बनती है सेहत
युनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के प्रोफेसर सर माइकल मैरमट पिछले करीब तीन दशक से जीवन संभावनाओं पर शोध कर रहे हैं और 1960 में उन्होंने लंदन में सिविल सेवा के अधिकारियों के स्वास्थ्य और जीवन पर जो शोध किया था वह काफी प्रामाणिक माना जाता है। उस शोध में निष्कर्ष निकाला गया था कि सिविल सेवा में जो अधिकारी जितने ऊंचे ओहदे पर होता है उसका स्वास्थ्य भी उतना ही बेहतर होता है, जिससे लंबी उम्र तय होती है। एक अन्य दिलचस्प निष्कर्ष निकाला गया है कि जिन अभिनेता-अभिनेत्रियों को ऑस्कर पुरस्कार मिला वे उनसे कुछ ज्यादा साल जिए जो इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए नामांकित तो हुए, लेकिन इसे प्राप्त नहीं कर सके।
धन से ‌नहीं मिलता स्वास्‍थ्य
सर माइकल मैरमट का मानना है कि व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य इस तथ्य से प्रभावित होता है कि समाज में उसकी क्या हैसियत है। सर माइकल ने इस प्रवृत्ति कोस्टेटस सिंड्रोमयानीप्रतिष्ठा प्रतीकका नाम दिया है। यह बात सच है कि किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत तय करने में दो चीजें मुख्य रूप से काम करती हैं कि हमारी अपनी जिंदगी पर हमारा कितना नियंत्रण है और समाज में हमारी क्या भूमिका है। सर माइकल के मुताबिक धन से अच्छा स्वास्थ्य नहीं खरीदा जा सकता, इसलिए व्यक्ति की आमदनी की भी कोई खास भूमिका नहीं होती।
अच्छे संस्कार हैं उम्र की बुनियाद
इन निष्कर्षों को इस तथ्य से और बल मिलता है कि कई छोटे और गरीब देशों के लोग क्यों अमेरिका और ब्रिटेन के लोगों से ज्यादा उम्र तक जीते हैं? सर माइकल मैरमट का कहना है कि अगर लोगों को अपने जीवन पर ज्यादा नियंत्रण दिया जाए तो उनकी उम्र बढ़ाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है। जाहिर है, बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा सुनिश्चित की जाए, कामकाजी लोगों को अपने जीवन पर ज्यादा नियंत्रण मिले तो आदमी लंबी उम्र पा सकते हैं।

साभार : अमर उजाला कॉम्पेक्ट

Saturday, July 2, 2011

लबो पर उसके कभी बददुआ नहीं होती


लबो पर उसके कभी बददुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती

इस
तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

अभी
जिंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा,
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

ए अँधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया

ख्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊ
माँ से इस तरह लिपटूं कि बच्चा हो जाऊ

'मुनव्वर' माँ के आगे यूँ कभी खुलकर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कराती है

-
मुन्नवर राना

Sunday, June 26, 2011

शरीफ़ लोगों को औरत बिगाड़ देती है

अना[1]की मोहनी[2]सूरत बिगाड़ देती है
बड़े-बड़ों को ज़रूरत बिगाड़ देती है

किसी भी शहर के क़ातिल बुरे नहीं होते
दुलार कर के हुक़ूमत[3]बिगाड़ देती है

इसीलिए तो मैं शोहरत[4]से बच के चलता हूँ
शरीफ़ लोगों को औरत बिगाड़ देती है

-मुनव्वर राना

शब्दार्थ:

1. ↑ आत्म-सम्मान
2. ↑ मोहक, मोहिनी
3. ↑ शासन
4. ↑ प्रसिद्धि

Friday, June 24, 2011

हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत )
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !!

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है !
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!!

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में !
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !!

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास )
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !!

किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा )
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा )

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर )
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली )

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव )
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा )

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद!
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!!

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है !
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!!

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर )
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!!

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे!
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!!

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं!
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!!

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म)
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!!

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की !
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत)
- मुनव्वर राना

साभार : आखिरी ग़ज़ल
http://bakhtabadnam.blogspot.com/2010/05/blog-post.html