Wednesday, June 8, 2011

पर्यावरण बचाने के लिए हिमालय के संरक्षण पर जोर

नौगांव (उत्तरकाशी)। सामाजिक एवं पर्यावरण कल्याण समिति द्वारा ‘पर्यावरण, प्राकृतिक आपदा एवं विकास’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में हिमालय के संरक्षण पर जोर दिया गया।
गोष्ठी में मुख्य अतिथि डीएवी कालेज देहरादून के प्राचार्य प्रो।एपी जोशी ने कहा कि जंगलों के अंधाधुंध कटान से पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। जल, जंगल व जमीन के संरक्षण के साथ ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार चारू चंद्र तिवारी ने कहा कि वन एवं पर्यावरण को बचाने में ग्रामीणों की भूमिका महत्वपूर्ण है।विधायक किशोर उपाध्याय ने पर्यावरण संरक्षण के लिए महिला संगठनों को जागरूक करने पर जोर दिया। दूरदर्शन के पूर्व संपादक राजेंद्र धस्माना, पत्रकार विजेंद्र रावत, दिनेश जोशी, शांति ठाकुर आदि ने पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘अपना गांव-अपना वन’ की अवधारणा के साथ लोगों को जागरूक करने की बात कही। इस मौके पर समिति के सचिव शशिमोहन, डा. विरेंद्र चंद्र, डा. रश्मि चंद्र, डा. बचन रावत, रमेश रावत, नगर पंचायत अध्यक्ष बुद्धि सिंह रावत, सकल चंद रावत, केंद्र सिंह राणा, आनंदी राणा आदि मौजूद थे। गोष्ठी का संचालन प्रमोद रावत ने किया।
साभार : अमर उजाला
http://www.amarujala.com/city/Utter%20Kashi/Utter%20Kashi-17133-17.html

पर्यावरण को बचाने के लिए सभी एनजीओ एकजुट होकर काम करें


विश्व पर्यावरण दिवस पर 'सामाजिक एवं पर्यावरणीय ल्या समिति" द्वारा जनपद उत्तर काशी के विकास खंड नौगांव के बीडीसी हॉल में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि प्रो. एसपी जोशी ने दीप प्रज्जवलित कर की। संगोष्ठी में महिला समूहों द्वारा अतिथियों के स्वागत के लिए स्वागत गान किया गया। संस्था द्वारा विभिन्न क्षेत्रों जैसे - पर्यावरण, कृषि, बागवानी, सामाजिक जागरूकता, स्वास्थ्य, राजनीति, शिक्षा, खेल-कूद के क्षेत्र में उत्कृष्ठ कार्य करने के लिए कई लोगों को सम्मानित किया गया और अतिथियों का शॉल भेंट करके सम्मान किया गया। इस मौके पर संस्था सचिव शशिमोहन पहाड़ी ने संस्था का संक्षि'त परिचय दिया और भविष्य की कार्य योजनाओं के बारे में जानकारी दी।

संगोष्ठी में संस्था के संरक्षक श्री विजेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए सभी गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को एकजुट होकर काम करना चाहिए। इसके लिए हिमालय टॉस्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए। यमुना और गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए यमुना घाटी विकास प्राधिकरण का भी गठन होना चाहिए। महिलाओं को रोजगार से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण से संबंधित योजनाएं बनाने में स्थानीय लोगों की राय ली जानी चाहिए।

कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री सकल चंद रावत ने कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए सामुहिक रूप से संगठित होकर प्रयास किया जाना चाहिए। रवांई क्षेत्र को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता हैं। रवांई-जौनपुर अपने आप में एक शोध का केंद्र हैं। आज सहकारिता और सहभागिता विलुप्त होती जा रही है। लोगों के अंदर सेवा भावना पैदा करने की आवश्यकता है। सरकारी काम केवल कागजों में होता है, जबकि गैर सरकारी संगठन ज्यादा प्रभावकारी कार्य कर सकते हैं। अत: इनको बढ़ावा दिया जाना चाहिए। जंगलों को बचाना है तो किसानों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। आज बड़ी-बड़ी कंपिनयों के जाल में किसान फंसता जा रहा हैं उसको घटिया किस्म का बीज और खाद वितरित की जा रही है। इसके लिए किसानों को जागरूक करना होगा।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो. एस. पी. जोशी ने बताया कि पर्यावरण एक प्रचलित शब्द है, जो दो घटकों - जैविक और अजैविक से मिलकर बना है। अजैविक घटकों में मिट्टी, पानी और हवा मुख्य हैं और यही जीवन का आधार हैं। इनको संरक्षित किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जंगल वहीं ज्यादा घने हैं, जहां मानव हस्तक्षेप नहीं हुआ। मानव हस्तक्षेप से ही जंगल नष्ट हुए हैं और जैविक घटकों की कमी होने लगी है। उन्होंने बताया कि 50 साल की उम्र का एक पेड़ अपने जीवन काल में 70 लाख रूपए की ऑक्सजीन मानव जाति को देता है और 50 साल में यही पेड़ लगभग 20 लाख रुपए की कार्बनडाई ऑक्साइड (CO2) अवशोषित करता है और मिट्टी के कटाव को रोककर लगभग 5 लाख रुपए की मिट्टी बचाता है।

उन्होंने बताया कि जब भी हमने पर्यावरण के साथ छेड़-छाड़ की तो हमें प्राकृतिक आपदा के रूप में भ्ाारी कीमत चुकानी पड़ी। यदि हम प्रकृति के नियमों का पालन करेंगे तो मानव जाति बची रहेगी। इसके लिए गांव-गांव एवं हर घ्ार-घ्ार में चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष लगाए जाने चाहिए। वृक्षों को बचाने के लिए ग्रामीण स्तर पर महिला मंगल दल एवं महिला समूहों की स्थापना होनी चाहिए, क्योंकि सामाजिक क्षेत्र और प्राकृतिक क्षेत्र को बचाने में महिलाएं सक्षम हैं।

इस अवसर पर दूरदर्शन के पूर्व संपादक श्री राजेन्द्र धस्माना ने कहा कि पर्यावरण, विकास और प्राकृतिक आपदाओं को हमें एक साथ देखना चाहिए, क्योंकि विकास के साथ विस्थापन प्राकृतिक आपदाएं और विकास की वे सारी बीमारियां हैं जो कम या ज्यादा हमारे पूरे जनजीवन को प्रभावित करती हैं। इसलिए जब भी हम विकास की बात करें तब हमें उन खतरों का सामाना भी करना होगा जो विकास के मॉडल से उपजती हैं इसलिए नीति-नियंताओं को चाहिए कि वह जब भी ऐसी परियाजनाओं पर काम करें उसमें जनता के हित सर्वोपरी हों और विस्थापन व प्राकृति संपदा को कम से कम नुकसान हो।

टिहरी के विधायक श्री किशोर उपाध्याय ने बताया कि पर्यावरण को बचाने के लिए अच्छी योजनाएं बनाई जानी चाहिए और पहाड़ों के लिए कोई भी योजना बनने से पहले वहां की भौगोलिक परिस्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। ग्रामीण स्तर पर किसानों को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और इसके लिए चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों को लगाया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि जल संरक्षण का भी प्रयास किया जाना चाहिए।

नगर पंचायत अध्यक्ष बड़कोट श्री बुद्धि सिंह रावत ने बताया कि पर्यावरण को बचाना है तो प्रदूषण को अपने घ्ार से हटाना होगा। उन्हांेने कहा कि पॉलिथीन की थैलियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

जनपक्ष आजकल के कार्यकारी संपादक श्री चारु तिवारी ने कहा कि स्थानीय धरोहरों को बचाने के प्रयास हों। उन्होंने कहा कि तिलाड़ी शहीदों ने जंगल बचाने की मुहिम छेड़ी थी और आज भी इसकी आवश्यकता है। 70 के दशक में जंगल बचाने के लिए वनांदोलनों का एक दौर चला जिससे चिपको आंदोलन का जन्म हुआ। इसमें महिलाओं और युवाओं ने भारी योगदान दिया। उन्होंने एक तर्क दिया कि एक मैच के दौरान जितनी बिजली एक स्टेडियम में खर्च होती है उससे कम से कम 7 गांवों को बिजली से रोशन किया जा सकता है।

मजदूर नेता प्रेम बल्लभ सुंदरियाल ने कहा कि आज आबादी बढ़ रही है और पानी कम हो रहा हैं इसके लिए सिवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि गंगा और यमुना का जल 30 प्रतिशत आबादी की पानी की आवश्यकता की पूर्ति करता है। सरकार द्वारा बड़े-बड़े डैम बनाकर लोगों को विस्थापित करने का षड्यंत्र किया जा रहा है।

इस मौके पर डा. विरेंद्र चंद्र, डा. रश्मि चंद्र, डा. बचन रावत, रमेश रावत, नगर पंचायत अध्यक्ष बुद्धि सिंह रावत, सकल चंद रावत, केंद्र सिंह राणा, आनंदी राणा आदि मौजूद थे। गोष्ठी का संचालन प्रमोद रावत ने किया।

Friday, May 20, 2011

पृथक जिले के लिए हस्ताक्षर अभियान 25 से

नौगांव (उत्तरकाशी)। यमुना घाटी पृथक जनपद की मांग को लेकर रवांई और जौनपुर के लोग २५ से ३० मई तक यमुनोत्री से लेकर ढाटमीर तक हस्ताक्षर अभियान यात्रा निकालेंगे।

यमुना घाटी विकास संगठन, रवांई लोक कल्याण समिति तथा सामाजिक और पर्यावरणीय कल्याण समिति की ओर से संयुक्त रूप से हस्ताक्षर अभियान शुरू किया जाएगा। इसमें रवांई और जौनपुर के हजारों लोग भागीदारी करेंगे। हस्ताक्षर अभियान यात्रा २५ मई को यमुनोत्री में मां यमुना की पूजा-अर्चना के साथ शुरू होगी। यहां से खरसाली, स्यानाचट्टी, खरादी, बड़कोट, नौगांव, पुरोला, मोरी, नैटवाड़ी, सांकरी, जखोल होते हुए ढाटमीर पहुंचेगी। यात्रा का समापन ३० मई को तिलाड़ी शहीद दिवस के अवसर पर बड़कोट में होगा। क्षेत्र के बुद्धिजीवियों का कहना है कि यहां की तमाम समस्याओं का समाधान सिर्फ पृथक यमुना घाटी जनपद का गठन ही है। हस्ताक्षर अभियान को पूरी तरह गैर राजनीतिक रखा जाएगा।

साभार : अमर उजाला

http://www।amarujala.com/city/Utter%20Kashi/Utter%20Kashi-15173-17.html

Wednesday, April 27, 2011

मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया - बशीर बद्र

हर इक चिराग कि लो ऐसी सोई-सोई थी
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी

नहा गया थे मै कल जुगनुओ कि बारिश में
वो मेरे कंधे पे सर रख के खूब रोयी थी

कदम-कदम पे लहू के निशान ऐसे कैसे है
ये सरजमी तो मेरे आंसुओ ने धोयी थी

मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया जिसमे
महकते फूल थे फूलो में एक तितली थी

खुद उसके बाप ने पहचान कर न पहचाना
वो लड़की पिछले फसादात में जो खोयी थी
- बशीर बद्र

Tuesday, April 5, 2011

मेरे मित्र उमेश कुमार द्वारा मुझे भेजी गई यह कविता जिंदगी बदल रही है. इसका सार है की इंसान की गिन्दगी किस करवट बदलती है, और उसे जिन्दगी में किन किन पड़ावों से गुजरना पड़ता है. मुझे लगा की इसे आप लोगों तक भी पहुँचाया जाय. इसी प्रयास के साथ.

यद ज़िन्दगी बदल रही है!!
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से “स्कूल” तक का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था
वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां “मोबाइल शॉप”, “विडियो पार्लर” हैं, फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है…

जब मैं छोटा था, शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी.
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था, वो लम्बी “साइकिल रेस”,
वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..

जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना, वो लड़कियों की
बातें, वो साथ रोना, अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है, जब भी “ट्रेफिक सिग्नल” पे मिलते हैं “हाई” करते
हैं, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दिवाली, जन्मदिन , नए साल पर बस SMS आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..

जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट थे केक, टिप्पी टीपी टाप.
अब इन्टरनेट, ऑफिस, फिल्म्स, से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है.

जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है.. जो अक्सर कबरिस्तान के बाहर बोर्ड पर लिखा होता है.
“मंजिल तो यही थी, बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी यहाँ आते आते ”

जिंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है.
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने मैं ही हैं.
अब बच गए इस पल मैं..
तमन्नाओ से भरे इस जिंदगी मैं हम सिर्फ भाग रहे हैं..
इस जिंदगी को जियो न कि काटो !